Sunday, May 26, 2024

आँखि में लोर,मन में पीरा बा, का कहीं -अनिल ओझा ‘नीरद’

तार तार लूँगा बा, झूला बा, का कहीं ?
देहिं तोपल-ढांकल त मुश्किल बा,का कहीं??

माथ पर ईंटा, कबों सिरमिट के तागड़ी बा ।
आँखि में लोर,मन में पीरा बा, का कहीं ??

कबों-कबों,किस्मति के पत्थरो ऊ तूरति बा ।
मजदूरिनि ह,काम त करहीं के बा,का कहीं??

भर देहिं पसेना बा,कपड़ा बा लदर- फदर ।
झंखति बा,झुरवति बा,लड़ति बा, का कहीं??

जिनिगी से जूझति बा, बंजर जमीनि अइसन।
अपने ले नइखे नूँ,माइयो बा, का कहीं ??

फाटल लूगा-झूला से,जवान देहिं झांकि जाता।
बूढो मजूरा तक , निहारता, का कहीं ??

घोंट-घोंट खून पियत,दिन कइसो कटि जाता।
राति,जार-जार रोवत बीतत बा, का कहीं ??

टटका टटका

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